Friday, November 18, 2011

आज बस खयालों का ही सहारा है


कुछ अनकही बातें, कुछ अनसुनी कहानीयां,
चाहत की वोह हसरतें ओर  उन्ही लम्हों के इन्तेजार,
हम  बेखबर  थे और वक्त बेखबर था|
छोटी  सी जिन्दगी, अनगिनत चाहतों की इल्तिजा
वजुद का सवाल और हासिल करने कि होड़,


सितम ढाता रहा
, वक्त जाता रहा|
और एक  शाम नदी  के  किनारे
उनकी जलती  चिता  कि  लौ  मे
आप बिती  कि वो तस्वीरे अंगार  की तरह
मुझे  खदेरा,  मै  पागलों  की  तरह भागा|
बहुत देर हो चुकी थी
और सब-खबर  बेअदब  वक्त जैसे हँस  रहा था|
शायद पीछली जिन्दगी थी
या फिर छोर आया था मानो कब वो सारी बातें -
पेहली  बादल  की  भरी  बरसात  मे
नंगे पाँव भींगि घासों पर चलना और
झुँकी टहनियो की शाख से फुलों की दस्ता चुन कर उनके  बालों  पर लगाना,
गरम चाय की  गिलास  मे  फुंकना  
उन  नरम  होंठो   को  जलन  ना हो,
बे माईने  बातों  पर मिलकर हँसना-
न जाने कब बे मानी अनकही अनसुनी पुरानी  हो गई|
आज आपबिती कि वो सारी तस्वीर
पीछली जिन्दगी से उभरकर जब सामने आई,
एक  नई एहसास उमरकर  दिल  भर  लाई,
जब  साथ  थी तब उनका होने  का एहसास न था,
आज  बस खयालों  का ही  सहारा है-

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